भोजपुरी लोक संस्कृति के सन्दर्भ में लोक सृजन का अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.59828/ijmrast.v4i7.299Keywords:
लोकसृजन, मौलिकता, संस्कृति, परम्पराएँ, सृजनात्मकता, लोक कथा, लोक गाथा, लोक कला, संस्कार गीत, लोक जीवन, लोकनाट्य, लोक काव्य ।Abstract
लोक सृजन शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है जिसमें पहला शब्द है लोक जिसका अर्थ है असभ्य, अशिक्षित। दूसरा शब्द है सृजन जिसका अर्थ है मानसिक प्रक्रिया जिसमें अनेक नये -नये विचार उत्पन्न होते हैं । लोक सृजन में मौलिकता होती है । भोजपुर के लोग अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक परम्पराओं के अवसर पर अनेक प्रकार के गीतों का गायन करते हैं ये गीत लौकिक होते हैं लोक निर्मित गीतों का गायन अनेक सामाजिक परम्पराओं के अवसर पर किया जाता है। लोक सृजन के अंतर्गत अनेक प्रकार की कलाएं देखने को मिलती है जिसमें ग्रामीण जन की सृजनात्मकता दिखती है। ग्रामीण लोगों के पास भले ही कोई स्कूली ज्ञान नहीं होता उनके पास कोई डिग्री नहीं होती है लेकिन उनके अंतः मन से निकले भाव गीतों के रूप में पिरों दिये जाते हैं । लोक स्वयं को गढ़ता है जो समय-समय पर स्वयं को परिवर्तित और परिवर्द्धित करता है और समाज के प्रत्येक वर्ग को अपने में समेटता और सहेजता है । इसी संदर्भ से लोक संसार का विस्तारण होता है। लोक काव्य अपने आप में वृहद है जो मानव मन की प्रकृति के आधार पर उपजता है इसमें लोक भावना से जिन विचारों की सहज उत्पत्ति और मन की स्वीकृति होती है वह आगे चलकर लोक गीतों के रूप में हमारे समक्ष आती हैं ।लोक सृजन में संस्कार गीत, लोक कथा, लोक गाथा, लोक कला, लोकनाट्य, लोक काव्य आदि का अध्ययन किया जाता है ।
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