विवेकी राय के उपन्यासों में सामन्ती जीवन मूल्यों के वर्चस्व का अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.61778/ijmrast.v4i3.252Keywords:
सामन्ती जीवन मूल्य, वर्चस्व, पदानुक्रम, जातिवाद, दासता, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक, गरीबीAbstract
विवेकी राय ग्रामीण सामाजिक और वैचारिक परिस्थितियों को उजागर करने वाले कथाकार कहे जाते हैं। इनके उपन्यासों में सामन्ती जीवन मूल्यों का वर्चस्व दिखाई देता है जिसमें समाज के उच्च, जमींदार या कुलीन वर्ग की विचारधारा, संस्कृति और परम्पराएँ, बाकी समाज पर अपना दबदबा बनाए रखती हैं। इसमें वफ़ादारी, पदानुक्रम, जातिवाद और परम्पराओं का पालन अनिवार्य माना जाता है, जिससे निचला वर्ग शोषित रहता है । यह एक सांस्कृतिक वर्चस्व है जो समानता के बजाय दासता और प्रदेश विशेष की सामाजिक स्थिति को अभिव्यक्त करता है। जीवन के समग्र चित्रण को लेखक परिवेश की सच्चाई को बड़ी बारीकी से समझते हैं चाहे वह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक तथा गरीबी किसी भी तरह की समस्या हो सभी को नजदीक से चिंतन करते हैं । इनके उपन्यास बबूल, पुरुष पुराण, लोकऋण, श्वेतपत्र, सोनामाटी, समर शेष है, नमामि ग्रामम्, मंगल भवन, अमंगलहारी आदि हैं। जिसमें राजनीतिक धोखाधड़ी, बेइमानी, तिकड़मी खेल, कब्जा, क्रूरता, आदि हथकंडे अपनाकर कृषकों एवं साधारण जनों का खुले आम शोषण करते रहे।
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