गौहत्या प्रतिबंध कानून - भारतीय राजनीति के संदर्भ में
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https://doi.org/10.61778/ijmrast.v3i12.216Keywords:
गौहत्या प्रतिबंध, संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 48), गो-तस्करी, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत, संविधान सभा की बहसें, लिंचिंग, सामाजिक तनावAbstract
भारत में गोहत्या पर प्रतिबंध एक ऐसा मुद्दा है जो हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक जटिल समस्या है। यह केवल एक विधिक विषय नहीं है, बल्कि यह धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक संवेदनशीलता, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था और राजनीतिक विमर्श से गहराई से जुड़ा हुआ प्रश्न है। गौहत्या भारतीय संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत राज्यों को गौवंश संरक्षण के लिए कानून संबंधी एक मार्गदर्शन प्रदान करता है, जिसके परिणामस्वरूप अधिकांश राज्यों ने गाय एवं उसके बछड़े की हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध और बैल व भैंस पर आंशिक अथवा पूर्ण नियंत्रण लागू किया है।
यह अध्ययन दर्शाता है कि भारतीय विधिक व्यवस्था में गौहत्या निषेध का प्रावधान गंभीर सजा और जुमार्ने के कारण से भले ही सुदृढ़ है, परंतु इसका क्रियान्वयन असमान, अधूरा और अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ है। जब इस व्यवस्था को जमीनी स्तर पर देखा जाता है, तो स्पष्ट होता है कि कानून और व्यवहार के बीच गहरी खाई मौजूद है। अवैध परिवहन, सीमापार तस्करी, अवैध बूचड़खाने और फॉरेंसिक जाँच की कमी जैसे पहलू दर्शाते हैं कि कठोर प्रावधानों के बावजूद तस्करी और अवैध वध की घटनाएँ निरंतर घटित होती रही हैं। कानून और जमीनी हकीकत के इस अंतर को समझना आवश्यक है ताकि एक ओर धार्मिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता का सम्मान हो और दूसरी ओर व्यावहारिक, मानवीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से नीतिगत समाधान विकसित किए जा सकें। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के हालिया मामलों से यह तथ्य पुष्ट होता है कि प्रतिबंधों के बावजूद एफआईआर और जब्त किया गया मांस इस समस्या की व्यापकता को उजागर करता है। साथ ही कानून का राजनीतिक और सांप्रदायिक उपयोग भी सामाजिक तनाव को बढ़ा देता है। अदालती फैसलों के बावजूद, ये कानून अपनी मंशा में सफल नहीं हो पाए हैं। परिणाम यह है कि कानूनी सख्ती के बावजूद, भीड़ की हिंसा ने कानून के शासन को सीधे चुनौती दी है।
जब तक कानून आर्थिक वास्तविकताओं को स्वीकार नहीं करते और कानून प्रवर्तन अधिक निष्पक्ष नहीं होता, तब तक यह राष्ट्रीय चुनौती सुलझ नहीं सकती। इस विषय को केवल आस्था या वोट बैंक की राजनीति से नहीं, बल्कि व्यावहारिक समाधान और संवैधानिक न्याय से हल होगा।
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