संत कबीर के सामाजिक एवं सांस्कृतिक विचारों का भारतीय समाज पर प्रभाव

Authors

  • डॉ० राजेश कुमार एसोसिएट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, सेटेलाइट केन्द्र, अमेठी Author

DOI:

https://doi.org/10.61778/ijmrast.v3i12.215

Keywords:

सृजन आत्मसिद्धि, निवारणीय, अहिंसक, निर्गुण, संकीर्ण सूक्ष्मतर

Abstract

संस्कृति मानव-जाति के अनवरत आत्म-सृजन की प्रक्रिया है। अपनी सृजनात्मकता का निरन्तर उत्कर्ष ही ’मानवीय आत्मसिद्धि’ है और उसके मार्ग में उत्पन्न अनेक ’निवारणीय अवरोधों’ को दूर करना वैयक्तिक ही नहीं, सांस्थानिक अर्थात् सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक संस्थानों का लक्ष्य और आचरण होना चाहिए। केवल तभी वे अपने को वास्तविक अर्थों में नैतिक या अहिंसक हो सकते हैं। जीवन मात्र के, अस्तित्व के प्रति लगाव, प्रेम, करुणा, अनुकम्पा का भाव और उनका सूक्ष्मतर बोध अहिंसा के भाव की ही गुणाभिव्यक्तियाँ हैं। कबीर साहेब प्रत्येक संकीर्ण सम्प्रदायिक भावना से मुक्त थे और उनका मुख्य अभिप्राय किसी ऐसी विचारधारा को जन्म देना था जो स्वभावतः सर्वमान्य बन सके और जिसमें इसी कारण किसी भी उल्लेखनीय प्रवृति के संचार की पूरी गुंजाइश हो सके। तदनुसार उन्होंने सामने उपस्थित समस्या पर अधिक से अधिक व्यापक दृष्टिकोण के साथ विचार करने का प्रयत्न किया और इस प्रकार निकाले गए परिणामों के मूल्यांकन का भार प्रत्येक व्यक्ति के निजी अनुभव पर ही छोड़ दिया। इसीलिए कबीर साहब की उस ऊँचाई से देखने पर जहाँ निर्गुण एवं सगुण के प्रश्न आपसे आप हल हो गए।

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Published

2025-12-30

How to Cite

संत कबीर के सामाजिक एवं सांस्कृतिक विचारों का भारतीय समाज पर प्रभाव. (2025). International Journal of Multidisciplinary Research in Arts, Science and Technology, 3(12), 64-71. https://doi.org/10.61778/ijmrast.v3i12.215