जंभवाणी में गुरु जंभेश्वर जी के आत्मविषयक कथन
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https://doi.org/10.61778/ijmrast.v3i11.200Keywords:
आत्मविषयक कथन, प्रहलाद, अमर, कुण जाणै म्हे, बारां, आद।Abstract
पंद्रहवीं सोलहवीं शताब्दी का संधि काल भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग है। उस समय में अनेकों महापुरुष अवतरित हुए, जिनके दिव्य ज्ञान व उपदेश से नयी चेतना भारतीय जनमानस में आयी। इसीलिए इस काल को सतयुग भी कह सकते हैं। इस समय धर्म और कर्म दोनों ही विनाश के कगार पर जा पहुंचे थे जिससे सारा वातावरण ही भयावह हो गया था। तब परमपिता परमात्मा अपनी प्रतिज्ञानुसार 'प्रहलादा सूं वाचा कीवी ,आयो बारां काजै। बारां में सूं एक घटै तो सूचेलो गुरु लाजै।'गुरु महाराज ने बताया मैंने सतयुग में नृसिंह रूप धारण करके हिरिणयकश्यपू को मारा था। उस समय प्रहलाद को मैंने वचन दिया था कि तुम्हारे साथ में तैंतीस करोड़ अनुयायियों का उद्धार करूंगा, इसीलिए मुझे यहां आना पड़ा है। यह कार्य पूर्ण हो जाने के बाद मैं शीघ्र ही वापस चला जाऊंगा। 'बारा थाप घणां न ठाहर।'
सतयुग व द्वापर युग के वचन एक साथ निभाने के लिए गुरु जंभेश्वर जी ने अवतार लिया तभी उन्होंने कहा 'न मेरे माय न मेरे बाप, म्हे अपनी काया आप सवारी।' अखंड सच्चिदानंद परब्रह्म परमात्मा नित्य एक रस रहने वाले शुद्ध स्वरूप के न तो कोई माता है न ही कोई पिता या कुटुंब परिवार ही है, किंतु जब भी जैसी आवश्यकता पड़ती है उसी के अनुसार वह अपनी नवीन काया का निर्माण स्वयं कर लेते हैं। अर्थात जैसा चाहते हैं उसी रूप में प्रकट हो जाते हैं। जैसा कि गीता आदि शास्त्रों में कहा है 'परमात्मा अपनी माया द्वारा सृष्टि की रचना करता है सांसारिक प्राणी तो माया के अधीन है किंतु वह त्रिगुणात्मिका माया परमात्मा के अधीन है। वैसे तो परमात्मा का स्वरूप अज, अव्यय, निराकार ,निर्गुण आदि विशेषताओं से युक्त हैं।.
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